The Great Hack, 2019: Documentary Review

 


              'लोकतंत्र' एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के नागरिक को यह भरोसा दिलाने की क्षमता रखता है कि उसके देश में चलने वाली शासन प्रणाली के पीछे उसकी एक अहम भूमिका है। इसके साथ ही वो व्यक्ति विशेष चाहे किसी भी समुदाय, धर्म, जाति या वर्ग से हो, एक लोकतंत्र में उस नागरिक का उतना ही महत्व है जितना की अन्य प्रतिष्ठित नागरिकों का। परन्तु समकालीन समय में क्या वाकई लोकतांत्रिक अधिकार अपनी परिभाषा को उतनी ही मजबूती से पकड़े हुए हैं जितने गौरव से वो किताबों में अंकित हैं? वोट डालने जा रहा नागरिक क्या वाकई अपनी राजनैतिक विचारधारा को लेकर बेफिक्र है की उसके दिमाग ने राजनीतिक पार्टियों के प्रति जो भी निर्णय लिया है उसमें सिर्फ उसी की भागीदारी है? या फिर इस विचारधारा व निर्णय को जन्म देने वाला कोई और है?

         भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक आम इंसान की राजनैतिक विचारधारा बनने की प्रक्रिया को देखते हुए टिप्पणी की जाये तो गली के कोने में दूकान पर बैठे नाइ, चौराहे पर सब्जी बेचने वाले दुकानदार या हमारे परिवार का कोई भी सदस्य, ये सभी लोग दिन भर में न जाने कितनी ही ख़बरों व लोगों के संपर्क में आकर अपनी  विचारधारा को प्रभावित करते हैं। समय के साथ मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट के इस्तेमाल व उसमें उपलब्ध सोशल मीडिया इस प्रतिक्रिया को और भी तेज कर देते हैं, जहाँ अब सिर्फ भगवान का सहारा लेते हुए 5 लोगों तक भेजने वाले सन्देश ही सीमित नहीं हैं, बल्कि यहाँ दुनियादारी की तमाम बातें हैं, जिसमें राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शन, धर्म, वेद-पुराण इत्यादि सब कुछ शामिल है, जो किसी न किसी रूप में हर इंटरनेट उपभोक्ता को काल्पनिक व वास्तविक दोनों तरह के तथ्य परोस रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है की इंटरनेट ने लोगों को मिलाया है और और व्हाट्सप्प - फेसबुक ने अपनों को, धर्म को!  हमारी संस्कृति - राष्ट्र जो कुछ भी हमसे पीछे छूट रहा था व्हाट्सप्प-फेसबुक के जरिये सब मिलने लगा है, हरियाणा-मुंबई के लोग समझने लगे हैं की 'सम्राट अशोक' पटना(बिहार) से सम्बन्ध रखते थे, उत्तर भारत जानने लगा है की नॉर्थ-ईस्ट और चीन में फर्क है, इत्यादि। इसके अलावा कुल मिला कर देखा जाये तो सोशल मीडिया द्वारा की गयी इस खेती से जो भरपूर पैदावार हुई उसका सेवन भारत के दक्षिणपंथ व वामपंथ दोनों गुटों ने बखूबी किया है और दोनों ही उसके स्वाद से प्रभावित हैं। हम नागरिक असल में बहुत बुद्धिमान हैं, सही-गलत समझते हैं पर इस तथाकथित 'सही- गलत' को आकार देने वाला ही अगर कोई तीसरा हो, तो ऐसे में यह निष्कर्ष कैसे निकाला जाये की किसी मतदाता के द्वारा लिया गया वैचारिक निर्णय उसका निजी मत है व किसी बाहरी साजिश से प्रभावित नहीं है।

        2018 में Netflix पर प्रसारित की गयी "द ग्रेट हैक" डॉक्यूमेंट्री सोशल मीडिया के इसी पहलु की तरफ इशारा करती है कि किस तरह डिजिटल युग एक नये पड़ाव पर है जिसके जरिये इंसान की मनोदशा के साथ हेरा-फेरी कर उन्हें अपने अनुकूल परिवर्तित किया जा सकता है। 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में 'डोनाल्ड ट्रम्प' की जीत इसका जीता जागता उदाहरण थी। 'द ग्रेट हैक' डॉक्यूमेंट्री के अनुसार डोनाल्ड ट्रम्प के 2016 के राजनीतिक अभियान की पूरी जिम्मेदारी 'कैंब्रिज एनेलिटिका' नाम की एक कंपनी को सौंपी गयी थी जो की राजनीतिक कंसल्टेंसी का कार्य करती थी। डोनाल्ड ट्रम्प की भावी जीत के पूरे डेढ़ साल बाद इस अभियान के एक नजरिये का खुलासा तब हुआ जब 'कैंब्रिज एनेलिटिका' के पूर्व रिसर्च डायरेक्टर "क्रिस्टोफर विली" ने सामने आकर अपनी बात रखी।  विली ने "द न्यूयॉर्क टाइम्स" से बात करते हुए यह बताया की इस अभियान के दौरान फेसबुक ने '80 मिलियन' अमरीकी फेसबुक उपभोक्ताओं की निजी जानकारी को बिना उनकी इजाजत के डोनाल्ड ट्रम्प की डिजिटल टीम के साथ साझा किया था, जिसका उद्देश्य था अमरीकी मतदाताओं की मानसिक प्रतिक्रिया को पहचानना साथ ही उनके अवचेतन में 'हिलेरी क्लिंटन' के प्रति नफरत भरना, जो तत्कालीन समय में अमरीकी राष्ट्रपति पद की दूसरी उम्मीदवार थीं। इस कार्यकारिणी ने ट्रम्प को twitter पर भारी मात्रा में प्रसिद्धि दिलायी, उनके प्रत्येक ट्वीट को हज़ारों की तादाद में आगे शेयर किया गया वहीँ दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर हिलेरी क्लिंटन की छवि को बिगाड़ने के लिए उन्हें मेक्सिको के प्रवासी नागरिकों का हितैषी करार कर दिया गया। इसके साथ ही क्रिस्टोफर विली ने इस अभियान के दौरान प्रयोग में लायी गयी तकनीक को भी सामने रखा जिसे "Psychographics" के नाम से जाना जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से किसी उत्पाद के विज्ञापन में किया जाता है ताकि ग्राहकों को लुभाया जा सके, लेकिन अब इसकी सीमा उत्पाद से कहीं आगे बढ़ चुकी है और आज के समय में हम इंसान भी इसके शिकार होते जा रहे हैं। 

       आज के समय में तकनीकी विकास का स्तर इतना ऊँचा हो गया है जहां ये सवाल जरूरी नहीं है की हम तार्किक हैं या सोशल मीडिया एक उपकरण है, बल्कि ये ज्यादा जरूरी है कि हम खुद एक उपकरण बनते जा रहे हैं और समय के साथ लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ती जा रही है जो किसी भी राष्ट्र के नागरिक एवं उसकी नागरिकता के प्रति जवाबदेही पर अंकुश लगाने का कार्य कर रही है।  ये बहुत जरूरी है की आज के समय में हम जिन भी विज्ञापनों, सूचनाओं के संपर्क में आ रहे हैं उन पर आँख बंद कर भरोसा न करें बल्कि अन्य कई स्त्रोत के माध्यम से उनकी पुष्टि भी करें, उसके पश्चात ही किसी विषय के प्रति अपनी अवधारणा बनाएं।

 

- शुभम शुक्ला

  12/09/2020

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